ठंडा मतलब.....कनपुरिये....!
पिछले दिनों जब हमारे राष्ट्रपिता के खून से सनी मिटटी की नीलामी की खबर सुनी तो दुःख हुआ और उससे भी ज्यादा दुःख तब हुआ जब उस नीलामी को रुकवाने के लिए हमारे शहर के पद्मश्री से सम्मानित साहित्यकार गिरिराज किशोर ने अपना पद्मश्री सरकार को लौटाने की घोषणा कर दी।लेकिन ख़ुशी एक बात की हो रही थी की एक बुजुर्ग साहित्यकार,गांधीवादी सोते हुए मेरे शहर को जगाने की कोशिश कर रहा था। 1857 की क्रांति का गवाह रहा कानपुर शहर तब भी नहीं जागा।मुट्ठीभर लोग फूलबाग गाँधी प्रतिमा पर विरोध दर्ज करवाने पहुंचे,'बापू' ने कभी जात -धर्म की राजनीति नहीं की शायद इस वजह से मेरा शहर बापू के साथ नहीं आया। । तेजी से बढ़ रहा मेरा शहर 'बापू' के मुद्दे पर क्यों कमज़ोर पढ़ गया ,क्योंकि अब 'बापू' की किसीको जरूरत नहीं है।'बापू' के नाम और काम पर बनी 'मुन्नाभाई' फिल्म के लिए तीन घंटे और पैसे हमारा शहर निकाल लेता है,लेकिन जब बात 'बापू, के खून से सनी मिटटी कि आयी तो क्यों मौन हो गए शहर के 'गांधीगिरी' करने वाले।तब से मन में ख़याल आ रहा था की आखिर कौन है 'कनपुरिया'...पान,पान मसाले की पीक से शहर को लाल करने वाला,ट्राफिक जाम से ज्यादा मोबाइल नेटवर्क के जाम होने की फिक्र करने वाला,हवा में घुले प्रदूषण को झेल कर भी मुस्कराने वाला,सरकारी अस्पताल में इलाज़ तलाशने वाला वाला,बीस मिनट में पिज्जा मंगाकर खाने वाला ।...जवाब ढूंढ रहा हूँ ,अभी तक नहीं मिला।इतना ठंडा हो गया 'कनपुरिया' की 'बापू' के नाम पर भी नहीं उबला खून ।मजदूरों का शहर मजबूरों का शहर बन गया।'बापू' के सिद्धांत भूलकर हम उनका 'सम्मान' तो पहले ही नीलाम कर चुके हैं अब क्या 'सामान' भी नीलाम होने से न रोक पाएंगे।कोई दिहाड़ी कमाने में और कोई होम लोन की किस्त चुकाने में इतना मशगूल हो गया की 'बापू' को भूल गया ।शुक्र है की लन्दन में नीलाम 'बापू' की यादें एक भारतीय ने ही खरीदी लेकिन ऐसी नौबत क्यों आई ये सोचने की बात है।तमाम मुश्किलों के बाद भी हमेशा चलता है कानपुर लेकिन 'बापू' के नाम पर भी जब मेरा शहर एकजुट नहीं हुआ तो बरबस मेरे मुह से भी निकल गया।..बापू तेरे देश में भांति-भांति के लोग।.........
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